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हनी ट्रैप में हैं 200 शिकार लेकिन रहस्यों की अंगार,अब राख में बदल रही....



घटना स्थल भोपाल, मगर केस इंदौर में बनवाया

डीजी स्तर के अधिकारी के हवस का खेल खुल रहा

- डाॅ. नवीन आनंद जोशी

भोपाल / म.प्र. के हनी ट्रैप कांड की खबरों में भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस और बड़े नौकरशाह, कुछ मीडिया के चंद लोग और ऐसे ग्राहक जो सफेदपोश होकर काले काम को अंजाम देते हैं सबके सब इन दिनों दुबके हुए हैं। जैसे-जैसे हनी ट्रैप के रहस्य उजागर होते गए वैसे-वैसे खबरों और सच्चाई के अंगारों पर राख चढ़ना शुरु हो गई । मीडिया के माध्यम से जिन पांच हनी सरगना के नाम उजागर हुए उसके बाद उनके गिरोह से 2 दर्जन से अधिक विष कन्याओं के होने के अंदेशा मिला साथ ही यह बात भी साबित हो गई कि उनके शिकार करीब 200 से ज्यादा हैं।
    शिकार 200 हैं, लेकिन एक का भी नाम सामने क्यों नहीं आया..? दरअसल सरकार में बैठे लोग हनीट्रैप मामले को उजागर करने में कम, दबाने में ज्यादा रुचि दिखा रहे हैं, कारण हैं बीते कई दशकों से चले आ रहा यह सियासत का खेल जिसमें कभी शह तो कभी मात होती है उसे इतनी आसानी से खत्म नहीं होने दिया जाएगा । यह बात भी सच है कि हनीट्रैप के शिकार होने और उन्हें शिकार करने वाले अपनी राजनीति में रसूख और नंबरों का खेल यूं ही चलाते रहेंगे । जो प्रकरण भोपाल में बनना थे, वो पूरा केस इन्दौर ट्रांसफर क्यों किया गया...? यह तिलस्म तो था ही ऊपर से बार-बार एसआईटी का चीफ बार-बार बदला जाना । जब कि जांच शुरुआती दौर में भी नहीं पहुंची है, मतलब साफ है इसे मामूली देह शोषण का मामला बना कर अकूत जन धन की हेराफेरी के बड़े मामले से लगभग खत्म कर दिया जाएगा । यदि कन्याओं ने प्रदेश के बड़े अय्याशों को काम के बदले जिस्म सौंपा तो वह धन किसी सेठ की तिजोरी से नहीं निकला था, वह पैसा आमजन के करों से आई आय का पैसा हैं। बहरहाल विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और खबरदार पालिका चारों स्तंभों से इस मामले में निकल रही सड़ाँध इस बात को स्पष्ट करती है की क्षणिक हवस का खेल मनुष्य को बुराई और बदनामी के गर्त में ले जाकर छोड़ता हैं।
    भोपाल में इसकी शुरुआत सन 2013 में तत्कालीन प्रदेश पुलिस प्रमुख रहे अफसर के चेंबर से  होती है। सबसे पहले श्वेता स्वप्निल जैन की मुलाकात उनसे हुई और काम के बदले साहब के अपने शौक पूरे होते रहे बाद में उन्होंने अपने मातहत एक एडीजी जो उन दिनों साइबर सेल में तैनात थे,उनके पास श्वेता को पहुंचा दिया ।अपने फन में माहिर श्वेता जैन ने उन एडीजी के सहारे साइबर सेल के सभी विश्वसनीय अफसरों और उनसे जुड़े स्टाफ मेंबर्स में अपनी पैठ बना ली, किंतु एक ऐसा शख्स जिसने श्वेता जैन का जादू समझ लिया था उसने काम करने से मना कर दिया बदले में उसका तबादला साइबर सेल से अन्यत्र कर दिया । यह भंडाफोड़ तभी हो जाता जबकि उस अधिकारी की बात को सुन लिया जाता ।खैर बेंगलूर स्थित जिस कंपनी के कर्ताधर्ता संतोष और उसके 5 साथी साइबर सेल में तैनात थे, वह अभी तक वहीं कार्य कर रहे हैं और उनका उपयोग पुरुषोत्तम शर्मा एडीजी ने किया और सारे सच एक-एक करके सारे उजागर हो गए ।
    इंदौर के हरभजन सिंह भोपाल में रहकर ही रातें रंगीन करता था और हवस की रकम भी यहीं पर देता रहा लेकिन बड़े अफसरों का नाम बचाने की खातिर क्राइम ब्रांच ने पूरा मामला इन्दौर में बनवाया और ट्रेप करने की रचना को अंजाम दिया । पूरा मामला भोपाल से ही जुड़ा है, लेकिन तीन करोड़ रुपए की मांग पर सरदार ने  अपने पदस्थापना स्थल पर बुलाकर उसमें से रूपये 50लाख देने और पूर्व नियोजित तरीके से पलासिया पुलिस के हाथों पकड़वाने का व्यूह रचना की । केवल हरभजन सिंह का मामला थाना पलासिया में दर्ज हुआ,अन्य सभी मामले भोपाल में बरकरार हैं ।
 यही हनीट्रैप संबंधित मामला थाना निशातपुरा में         28 सितंबर को पंजीबद्ध हुआ, जिसमें पुलिस अधिकारियों की लिप्तता होने के कारण अपराध क्रमांक 904/2019 धारा 389, 506, 294 में भी आरोपी को गिरफ्तार किया । जिसमें एक थाना प्रभारी हरीश यादव (तत्कालीन टीआई अयोध्या नगर भोपाल) की संलिप्तता पाई गई जो वर्तमान में सागर जिले में पदस्थ हैं । उन्हें व अन्य पुलिस अधिकारियों के शामिल होने के कारण निलंबित कर दिया गया, साथ ही यह भी ज्ञात हुआ है कि हरीश यादव ने सागर जिले में भी यही कार्यप्रणाली अपना कर कई कॉल गर्ल के माध्यमों से व्यापारियों और बड़े अधिकारियों को अपना शिकार बनाकर अड़ीबाजी से लाखों रुपए कमा लिए थे, किंतु केस दबा दिए गए । वर्तमान आईजी सतीश सक्सेना ने जांच आदेशित कर यह उजागर कर दिया । इस संपूर्ण घटना का माध्यम राजगढ़ की वह युवती मोनिका यादव जो अब सरकारी गवाह बन गई है और आरती दयाल जिसने सरकारी गवाह बनने की इच्छा जाहिर कर दी है । जांचें और विवेचना के दौरान कई चैंकाने वाले तथ्य सामने आएंगे इस प्रकरण में विधान सभा सचिवालय के तत्कालीन सचिव सत्यनारायण शर्मा की बेटी श्रुति शर्मा और उसकी सहपाठी रुचि के प्रकरण भी जुड़ रहे हैं। इसी क्रम में एक और डीजी स्तर के अधिकारी  जिन्हें हाल ही में शिकायत के उपरांत महत्वपूर्ण शाखा से  हटाकर पुलिस मुख्यालय अटैच किया गया है ।यह भी सामने आया है कि उन्होंने अपनी ब्याहता पत्नी  के रहते एक दूसरी प्रिया शर्मा (परिवर्तित नाम) को भी भोपाल के गुलमोहर कॉलोनी त्रिलंगा शाहपुरा क्षेत्र में अलग से रख कर अपनी हवस का माध्यम बना रखा था और उसके लिए पूरा खर्च उठाते थे । अगस्त 2019 में यह महिला गौरवी संस्था के माध्यम से महिला पुलिस थाने पर शिकायत लेकर पहुंची, उस शिकायत होने पर मामला दबा दिया गया किन्तु पुलिस के इतने बड़े अधिकारी होते हुए मामले को दबाने के लिए पहले थाने पर जमकर ड्रामा हुआ। उसके बाद महिला को समझा-बुझाकर कुछ समय के लिए चुप रहने की समझाईश के साथ फिलहाल पिंड छुड़ा लिया गया है । ये  वही अधिकारी हैं जो दूरसंचार में पदस्थ रहते हुए भर्ती घोटाले के मुख्य अभियुक्त थे और वर्ष 2003 में डीजीपी दिनेश जुगरान ने इनकी वजह से पूरी भर्ती निरस्त की थी तथा वर्ष 2007 में पुलिस महानिदेशक आनंद राव पवार इनके भ्रष्टाचारी आचरण पर इन्हें सख्त चेतावनी देकर छोड़ा था । इन्हीं के एक अन्य नजदीकी रिश्तेदार राकेश गौतम ने एक प्रताड़ना के प्रकरण में (क्रमांक 563/2013 रायसेन में) यह कहा कि मेरे जीजाजी के.एन. तिवारी आईपीएस है मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता,इनकी पूरी पृष्ठभूमि बताती हैं । इसी क्रम में भोज विश्वविद्यालय की मंजू निगम ने भी कार्यस्थल पर भी प्रताड़ना की शिकायत की थी लेकिन डीजी स्तर के इन्हीं अफ़सर के हस्तक्षेप से अपने रिश्तेदार सनत पाण्डेय को बचाने के लिये मामला खतम करवा दिया ।
    एसआईटी के चीफ राजेंद्र कुमार कासाब के प्रशंसक रहे हैं..... जिन दिनों राजेंद्र कुमार इंदौर में पदस्थ थे अजमल कसाब का प्रकरण चर्चा में था, राजेंद्र कुमार की यह टिप्पणी  अपने पुलिस ट्रेनिंग के अधिकारियों के बीच में कि आदमी हो तो कसाब जैसा.....जिसके उपरांत उन्हें रातोंरात डीजीपी एसके राउत ने चलता किया था वह एसआईटी के चीफ बनाए गए हैं ।
    जिन अधिकारियों को एसआईटी ने अभी तक अभयदान दे रखा है उन पर म.प्र. सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण) तथा अपील की धारा 9 एवं 14 के उल्लंघन का प्रकरण दर्ज हो जाना चाहिए था और अधिकारियों को इस संबंध में गृह मंत्रालय तथा सामान्य प्रशासन मंत्रालय द्वारा सूचना पत्र भी दिया जाना था जो नहीं दिया गया । लगता है सरकार और उसमें बैठे बड़े संचालकों ने हनीट्रैप को एक हथियार बना लिया है जिसका डर दिखाकर ही काम करवाया जा रहा है ।
डॉ. नवीन जोशी

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