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रेलवे का निजीकरण :देश होगा बेपटरी .....



कितना सही हैं रेलवे का निजीकरण...?


पता नहीं हम कब समझेंगे कि सरकार जनता को हिन्दू मुस्लिम और अन्य सामाजिक मुद्दों में उलझा कर देश की संपत्ति को एक एक कर के निजी हाथों के हवाले करती जा रही हैं!

कुछ दिन पहले ही रेलवे के निजीकरण का रास्ता साफ कर दिया गया है.केंद्र सरकार की एक उच्च स्तरीय समिति ने देश में 100 रेलमार्गों पर लगभग 150 प्राइवेट ट्रेनों के परिचालन को मंजूरी दे दी है।
जिसके लिए न सिर्फ देसी बल्कि विदेशी कंपनियोँ को रेलवे ने आमंत्रित किया है.

समिति की सिफारिश है कि भारतीय कंपनियों के साथ- साथ उन विदेशी कंपनियों को भी इसमें हिस्सा लेने की मंजूरी दी जाए, जिनका रेलवे तथा पर्यटन सेक्टर्स में काम करने का अनुभव हो और कम से कम 450 करोड़ रुपये की पूंजी हो.

● रेलवे कह रहा है कि जिस रूट पर चलेगी उस रुट पर प्राइवेट ट्रेन के खुलने के लिए निर्धारित समय के 15 मिनट के भीतर कोई दूसरी रेग्युलर ट्रेन नहीं चलाएगा.और वह यह कि इस योजना के मुताबिक, किसी रूट पर अपने गंतव्य तक पहुंचने में प्राइवेट ट्रेन उतना ही समय लेगी, जितना उस रेलमार्ग पर सबसे तेज चलने वाली सरकारी ट्रेन लेती है.

यानी साफ है कि प्राइवेट ऑपरेटर की सुविधा के लिए रेलवे अपनी ट्रेन को लेट कराएगा और ऐसा भी नही है कि प्राइवेट ट्रेन जल्दी अपने गंतव्य तक पुहंचेगी, वह भी सरकारी ट्रेन जितना ही समय लेगी.

तो यही काम क्या रेलवे अपने संसाधनों के साथ नही कर सकता था?सबसे बड़ी बात तो यह है कि इन प्राइवेट कंपनियो को मनमाना किराया तय करने और अपनी मर्जी से स्टॉपेज तय करने की सुविधा दी जा रही हैं, प्राइवेट ऑपरेटर को यह छूट है कि वह किसी भी कंपनी से कोच और इंजन खरीदने के लिए स्वतंत्र हैं यानी जिस तरह से सस्ते चीनी सामानों से देश के मार्केट भरे हुए हैं ऐसा ही रेलवे के क्षेत्र में होने जा रहा है ये नयी कंपनियां सीधे विदेशी कारखानों से सामान खरीदेगी और यहाँ के रेलवे कारखानों पर ताला डल जाएगा!जिन 100 रेलमार्गों पर 150 ट्रेन चलाए जाने की बात की जा रही हैं, वह सब फायदेमंद रुट है और फायदेमंद मार्गों पर निवेश को प्रोत्साहित करने की सरकारी नीति, अनिवार्य रूप से कम यात्री वाले मार्गों पर सेवाओं को बंद करने से और उन पर बढ़ते किराए का कारण बन जाएगी. यह रेल के निजीकरण के अंतर्राष्ट्रीय अनुभव को देखते हुए कहा जा सकता है

विश्व के जिन देशों ने रेलवे का निजीकरण किया, उन्हें पुन: राष्ट्रीयकरण के लिए विवश होना पड़ा हैं.

ब्रिटेन ने भी रेलवे का निजीकरण किया था लेकिन अब वहां भी जोर शोर से एक एक करके रेल ट्रैक का राष्ट्रीयकरण किया जा रहा है .

अर्जेटीना को भी दुर्घटनाओं में बढ़ोतरी के बाद वर्ष 2015 में रेलवे का फिर से राष्ट्रीयकरण करना पड़ा हैं,
न्यूजीलैंड ने वर्ष 1980 में रेलवे का निजीकरण किया, लेकिन भारी घाटे के बाद वर्ष 2008 में पुन: राष्ट्रीयकरण को मजबूर होना पड़ा.

यही स्थिति आस्ट्रेलिया में भी देखी गई, जहां 'गिव अवर ट्रैक बैक' आंदोलन के बाद सरकार ने रेलवे को फिर से अपने हाथों में लिया है.

■ विश्व मे जो रेलवे के निजीकरण के अनुभव है वह यही बताते है कि रेलवे के निजीकरण के पक्ष में दी गई कोई भी दलील सच नहीं होती है.

प्राइवेट ऑपरेटर को सिर्फ अपने मुनाफे से मतलब होता है, उसे यात्रियों के जेब से पैसा निकालना आता है, वह जानता है कि जब सबसे ज्यादा अर्जेन्सी होगी तब वह सबसे ज्यादा किराया आसानी से वसूल कर लेगा.

इस साल दिवाली पर देश की पहली प्राइवेट ट्रेन तेजस का किराया उसी रुट के हवाई किराए को टक्कर दे रहा था.

निजीकरण के समर्थक भी अच्छी तरह से जानते हैं कि प्राइवेट ऑपरेटर को जनता की बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा करने से कोई मतलब नही है और न ही उसके लिए सामाजिक लक्ष्य हासिल करना कोई जिम्मेदारी होती  हैं बल्कि वह सिर्फ और सिर्फ मुनाफा कमाना जानता है, लेकिन उसके बाद भी आपके आसपास ऐसे लोग पाए जाते हैं जो रेलवे जैसी आधारभूत सेवाओं के निजीकरण की कोशिशों पर खुश हो रहे होंगे. कितना दुखद है!

डॉ. नवीन आनंद जोशी

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